Monday, March 17, 2008
हर आदमी परेशान है
जिधर देखो उधर दौड़ते हुए इंसानी जिस्म दिख जायेंगे। दो मिनट की फुरसत नही है की दूसरो का हालचाल ले सके। पड़ोस में कोई मर गया है लोगबाग़ भीड़ की शक्ल में जमा है। मोहन बाबू बार बार बेचैनी से कलाई पर बंधी घड़ी को देख रहे है उफ़ लगता है पार्टी शुरू हो गयी होगी। शुक्ला जी को भी मरने के लिए आज का दिन ही मिला था।
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